Payen Napunsakta Ki Puri Jankari

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पायें नपुंसकता (नामर्दी) की पूरी जानकारी

नामर्दी (Impotency)-

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जब कोई पुरूष पूर्ण रूप से अथवा आंशिक रूप से स्त्री के साथ संभोग करने में असमर्थ हो जाता है, तब इसको Impotence नाम से संबोधित किया जाता है। संभोग सामथ्र्य का अभाव हो जाना ही नपुंसकता है। नपुंसकता शब्द पुरूष के लिए है, स्त्री के लिए नहीं। नपुंसकता का सीधा अर्थ पुरूष के शिश्न की उत्थान शक्ति से संबंधित है। जब पुरूष के शिश्न की उत्थान शक्ति घट जाती है अथवा क्षीण हो जाती है, तब Impotency उत्पन्न होती है।

नामर्दी के प्रमुख प्रकार-

नपुंसकता के कई प्रकार हो सकते हैं, लेकिन प्रमुख रूप से देखा जाये तो Impotence तीन प्रकार की होती है-
1. शारीरिक नपुंसकता।
2. मानसिक नपुंसकता।
3. पैतृक नपुंसकता।
शारीरिक नपुंसकता तथा मानसिक नपुंसकता को ठीक किया जा सकता है। रोगी स्वस्थ हो जाता है और मैथुन करने में सक्षम भी हो जाता है, लेकिन पैतृक Impotence को ठीक कर पाना असंभव है। यह लाइलाज असाध्य Impotence है। इन तीनों प्रकार की नपुंसकता का नीचे विस्तार से उल्लेख किया जा रहा है, जो इस प्रकार है..

शारीरिक नामर्दी :

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शारीरिक Impotence, रोगी अपने ऊपर स्वयं मोल लेता है। शारीरिक Impotence का अर्थ होता है शरीर संबंधी किसी कमजोरी अथवा विकृति की वजह से उत्पन्न हुई Impotence का हो जाना। इसमें हस्तमैथुन करना प्रमुख होता है। वैसे तो दुनियां का हर नौजवान अपने जीवन में हस्तमैथुन अवश्य करता है, लेकिन मामूली हस्तमैथुन से शिश्न में कोई विकार उत्पन्न नहीं होता, लेकिन अत्यधिक हस्तमैथुन घातक होता है। इससे शिश्न की शक्ति का हृास उत्पन्न होने लगता है। शिश्न अपनी शक्ति खो देता है और पुरूष, स्त्री से सहवास करने हेतु सर्वथा अथवा आंशिक रूप से असमर्थ हो जाता है।

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इसी प्रकार गुदामैथुन, वेश्यागमन से भी शारीरिक नपुंसकता आ जाती है। वेश्यागमन से तो अनेक रोग भी शरीर में आ विराजते हैं। उन रोगों का नाश करने के लिए आजकल अनेक विषैली एलोपैथी औषधियों का प्रयोग होता है। इन रोगों के कारण तो नामर्दी आती ही है, लेकिन खतरनाक औषधियां भी शरीर पर कम घातक प्रभाव नहीं डालतीं, जो Impotence के लिए आगे चलकर जिम्मेदार बनती हैं। वह भी शारीरिक नपुंसकता का ही एक हिस्सा है। अत्यधिक स्त्री प्रसंग करने से भी शारीरिक क्षमता की कमी हो जाती है। गंभीर रोग भोगना अथवा भोगकर उठने से शरीर में इतनी कमजोरी आ जाती है कि रोगी कुछ दिनों तक, जब तक उसमें पुनः शक्ति का संचार नहीं हो जाता, उसकी सहवास की इच्छा नहीं होती। लेकिन इस प्रकार की नामर्दी अस्थाई होती है। नशे की लत, गंदी संगत में पड़े रहने से भी शारीरिक नामर्दी का जन्म होता है।

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शारीरिक नामर्दी आमतौर पर शिश्न की कमजोरी ओर इशारा करने वाला विकार है। अत्यधिक हस्तमैथुन से शिश्न में कई प्रकार के विकार आ जाते हैं, जिसमें शिश्न टेढ़ा हो जाना, ध्वज भंग हो जाना प्रमुख हैं। हस्तमैथुन से शिश्न की नस-नाड़ियां पर भी कुप्रभाव पड़ता है और शिश्न मैथुनकाल में असमर्थ हो जाता है।

मानसिक नपुंसकता :

इस प्रकार की Impotence में पुरूष शारीरिक दृष्टि से तो एकदम सक्षम अथवा आंशिक सक्षम रहता है, लेकिन फिर भी वह स्वयं को कमजोर, असहाय, बेबस, अक्षम, निरूत्साहित, बेजान अनुभव कर, स्त्री से कोसों दूर रहता है। इस प्रकार की गलतफहमी आमतौर पर लोभी वैद्यों तथा ‘दुष्ट मित्रों’ से स्कूल, काॅलेज के जमाने में अज्ञानता से उत्पन्न होती है।

कुछ विद्यार्थियों को हस्तमैथुन की आदत गंदी सोहबत में पड़ जाती है और वे अपने आपको नपुंसक मान लेते हैं। इसके अलावा किस्से-कहानियां, अज्ञानियों के सम्पर्क, दुष्ट वैद्यों के परामर्श से इस प्रकार के युवक अपने आपको स्त्री के लिए सर्वथा अयोग्य, हीन समझ बैठते हैं, जबकि वास्तवक में ऐसा कुछ होता नहीं।

सच कहा जाये तो नामर्दी के अधिकांश मामले मानसिक होते हैं। इस प्रकार के रोगियों का इलाज मात्र मन से वहम निकालना भर है। अगर रोगी के मन से वहम निकल जाये, तो नामर्दी अपने आप ही चली जायेगी।

मानसिक नपुंसकता कई कारणों से हो सकती है। इसमें सबसे प्रमुख हैं- स्वयं को रोगी समझ बैठने की भ्रान्त धारणा का मस्तिष्क में उदय होकर धीरे-धीरे बलवती होते चले जाना। बुरी संगत से तथा गलत लोगों के सुने-सुनाये बेबुनियादी तथ्य या धारणायें मानसिक नामर्दी की नींव में अवश्य होते हैं। जैसे हस्तमैथुन से शारीरिक नपुंसकता जो थोड़ी बहुत आनी है, वह तो अलग रही, रोगी यह सोच-सोच कर ही दुखी परेशान होता रहता है कि हस्तमैथुन की आदत की वजह से नामर्दी के दलदल में फंसकर डूबने के कगार पर है। इसी प्रकार की मिथ्या बातें अपने दिमाग में पक्की तरह बैठा लेने से रोगी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाता और अंदर ही अंदर झुलस रहता है।

यह ठीक है कि लिंग में योनि का कसाव अलग प्रकार का होता है। लेकिन हाथ की मुट्ठी का कसाव उत्तेजना से बहुत ज्यादा हो जाता है और आनंद की अनुभूति भी थोड़ी ज्यादा हो सकती है। ऐसा व्यक्ति जो हस्तमैथुन का आदि हो जाता है, उसको योनि का कसाव उतना अधिक नहीं भाता है, जितना कि उसके हाथ की मुट्ठी का। अज्ञानतावश योनि में संभोग की तृप्ति न हो पाने से हस्तमैथुन सुखभोगी अपने आपको कमजोर या हीन समझ बैठते हैं। यही हीनता जड़ जमाकर स्थाई प्रभाव पैदा कर देती है।

शिश्न में अनेक बारीक रक्तवाहिनियां रहती हैं। उत्तेजनावस्था में शिश्न में तेजी से रक्त एकत्र हो जाता है। हाथ की कठोर हड्डियों के प्रभाव से शिश्न की ये कोमल रक्तवाहिनियां क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इस विकार की वजह से रक्तवाहिनियों में रक्त का प्रवाह पूर्ण तेजी के साथ नहीं हो पाता है। रक्त की कमी की वजह से शिश्न के तनाव अथवा उत्तेजना में थोड़ी कमी आ जाती है। ऐसा होना स्वाभाविक है।

यदि समय रहते हस्तमैथुन बंद कर दिया जाये, तो बेहतर है, वर्ना धीरे-धीरे यह विकार और अधिक बढ़ जाता है। हालांकि इसका इलाज होना संभव है, परन्तु फिर भी अगर इस प्रकार की कमजोरी को दिमाग में पाल लिय गया अर्थात् इस हीनताजन्य विकार को बुरी तरह से दिमाग में जमा लिया गया तो उसको दिमाग से निकाल बाहर करना थोड़ा कठिन है, लेकिन असंभव बिल्कुल भी नहीं।
मानसिक विकार ग्रस्त रोगी को किसी मनोरोग विशेषज्ञ के पास समय रहते भेज देना चाहिए। यदि यह ग्रंथि बन गई, तो उसको निकाल पाना कठिन हो जाता है। मनोरोग चिकित्सक, मानसिक नपुंसकता के शिकार रोगियों को स्वस्थ कर देते हैं और ऐसे रोगी मानसिक विकार दूर होते ही सक्षमता से मैथुन आनंद लेने लगते हैं।

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मानसिक नपुंसकता के कारण-

मानसिक नपुंसकता के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें से प्रमुख निम्नांकित हैं :-
1. चिंता-तनाव।

2. किसी प्रकार गहरा दुख व शोक।

3. किसी प्रकार का दिली लगाव।

4. क्रोध।

5. अति निराशा उत्पन्न हो जाना।

6. किसी प्रकार का गहरा अपमान या अपमानित हो जाना।

7. किसी प्रकार की घृणा का भाव।

8. घरेलू कलेश-कलह।

9. विरक्ति का भाव जागृत हो जाना।

10. मस्तिष्क का कार्यभार बढ़ जाना।

11. मनपसंद जीवनसाथी का न मिलना।

12. नपुंसकों की संगति में रहना।

13. अति धार्मिक स्वभाव।

14. खुद को नपुंसक समझने लग जाना।

15. किसी प्रकार का डर-भय आदि।

उपरोक्त कारणों से रोगी मानसिक नपुंसकता पाल बैठता है। ऐसा रोगी मैथुन(संभोग) क्रिया, पूर्ण रूप से सम्पन्न कर पाने में असमर्थ रहता है। यदि किसी प्रकार मैथुन करने में कामयाब हो भी जाता है, तो दिल में कहीं न कहीं ये भाव रह जाता है कि आनंद अधूरा था या फिर कोई कमी थी। अधिकांश मामलों में शीघ्रपतन हो जाता है।

पैतृक नपुंसकता-

पैतृक नपुंसकता पिता की ओर से पुत्र को प्राप्त होती है। यह नपुंसकता पिता के वीर्यदोष की वजह से पुत्र के शरीर में जन्मजात उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार के जन्मजात नपुंसक व्यक्ति को समाज में ‘हिजड़ा’ कहा जाता है। हिजड़ों में स्त्री भाव तथा पुरूष भाव दोनों प्रकार के विद्यमान होते हैं। ऐसे लोग अर्थात् हिजड़े न स्त्रियों में गिने जाते हैं और न ही पुरूषों में।

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केवल पुरूषों के लिए हिंदी में ब्लाॅग, जानिए नपुंसकता क्या है? और नपुंसकता का इलाज (Napunskata Ka Ilaj or Impotence Treatment Hindi). 9211166888
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Chetan Anmol Sukh
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