Namardi Ki Dawa

Namardi Ki Dawa

नामर्दी की दवा

नपुंसकता, नामर्दी, मर्दाना कमजोरी
(Impotency)

नपुंसकता एक विकट समस्या-

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पूरे विश्व में नपुंसकता एक विकट समस्या के रूप में उभरी है। इसकी वजह है- सामाजिक बदलाव, नशीली वस्तुओं एवं औषधियों का व्यापक प्रयोग, गंदी फिल्मों का प्रसार आदि। संसार के अधिकांश व्यक्ति शारीरिक नपुंसकता की बजाय मानसिक नपुंसकता के शिकार होते हैं। मानसिक नपुंसक व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से हृष्ट-पुष्ट और बलिष्ठ होते हैं, लेकिन स्त्री के समक्ष भीगी बिल्ली बन जाते हैं। यह कोई रोग नहीं है, बल्कि शरीर में उठा हुआ एक लक्षण मात्र है, जो मनोवैज्ञानिक रीति से ठीक हो सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

मानसिक नपुंसकता कई कारणोें से हो सकती है। कामोत्तेजना के दौरान सहसा उठे व्यवधान अथवा किसी अनजानी, अनचाही रूकावट के परिणामस्वरूप उत्तेजना ढीली पड़ जाती है। यदि पूर्णतः ढीली नहीं भी पड़ी तो मैथुन तृप्ति अवस्था तक पहुँचे बगैर ही समाप्त हो जायेगा। अत्यधिक शर्मिलापन, हीनभावना, भय, अपराध भावना, दुख, रोग, शौक, चिंता, तनाव आदि के कारण भी नपुंसकता आ घेरती है।

पूर्ण सक्षम होते हुए भी यदि किसी कारणवश ‘रतिक्रिया’ असफल हो जाती है, तो स्वाभाविक है पुरूष के अंदर आत्मग्लानि घर कर जायेगी और यहीं से प्रारम्भ हो जाती है नपुंसकता।

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कई बार ऐसे मामले भी देखने में आते हैं कि रतिक्रिया के दौरान अक्सर कोई दरवाजा खटखटा देता है अथवा कोई बच्चा रोने लगता है अथवा समय का अभाव रहता है अथवा किसी के आ जाने की आशंका बनी रहती है, तब हड़बड़ी और घबराहट में मैथुन क्रिया असफल हो जाती है। यदि ऐसी स्थिति अक्सर बनी रहे तो नपुंसकता आन में देर नहीं लगती। कुछ व्यक्ति इसलिए भी नपुंसक हो जाते हैं, क्योंकि वे व्यापार, व्यवसाय, घाटा-नफा आदि के संदर्भ में लगातार चिंता में डूबे रहते हैं। अतः रतिक्रिया के दौरान भी यह चिंता उनका पीछा नहीं छोड़ पाती और संभोग असफल हो जाता है। किन्हीं कारणों से उठी उदासीनता, असंतुष्टि, तनाव आदि भी मैथुन इच्छा लहरों को मस्तिष्क से निकाल बाहर फेंकती है और पुरूष चाहकर भी इच्छित फल प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है।

नपुंसकता के अनेक मामलों में ऐसे भी मामले देखने में आते हैं कि पूर्ण सक्षम पुरूष मात्र इसलिए नपुंसक हो जाते हैं, क्योंकि उनकी पत्नी अक्सर ‘इंकार’ कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप पुरूष की संभोग आनंद की भावनायें धीरे-धीरे सोने लगती है।

घरेलू कलह, तनाव, लड़ाई-झगड़े, कोर्ट-कचहरी के मामले आदि भी कामेच्छा पर हीनता का पर्दा डालते हैं। पति-पत्नी एक छत के नीचे रहते हुए भी अजनबियोें की भाँति रहने लगते हैं। एक पलंग पर अगल-बगल सोने के बावजूद भी वे एक-दूसरे की भावनाओं से सर्वथा अनजान रहते हैं, क्योंकि उनकी खुद की भावनायें, उनकी अपनी परिस्थितियों की वजह से सुप्तप्राय हो चुकी रहती हैं। ऐसी अवस्था में भी नपुंसकता यदि आ घेरती है तो कोई आश्चर्य अथवा विस्मय की बात नहीं है।

यदि पति किसी कारणवश हीनभावना का शिकार है अथवा पत्नी स्वयं हीन ग्रन्थि से पीड़ित है, तो दोनों एक-दूसरे के अंदर से इस जटिल समस्या को निकाल कर सुखमय जीवन जी सकते हैं। अधिकांशः ऐसे मामलों में अज्ञानता, अपना दोष दूसरे पर मढ़ने की भावना, प्रतिद्वंद्विता, हीनभावना आदि आड़े आ जाती है। कोई उमंग नहीं, कोई उत्साह नहीं, कोई जोश नहीं सब कुछ नीरस।

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मैथुन के प्रति कटी-कटी रहने वाली महिलायें अक्सर पुरूषों के दोष ढूंढकर उनको निरूत्साहित करने के उपाय खोजती रहती हैं। फल निकलता है नपुंसकता। इस प्रकार के जोड़े यदि मैथुनरत हुए भी तो मैथुन सफल, तृप्त होने में संदेह होना स्वाभाविक है। वैसे यदि स्त्री ठंडी हो तो संभोग कभी-कभार सफल हो जाता है। पुुरूषों की नपुंसकता के कुछ मामलों में स्त्रियों के रूखे व्यवहार की शिकायतें आम देखने को मिलती हैं।

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अनेक पुरूष जबरन अपने आपको बिना वजह नपुंसक मानकर जहाँ-तहाँ इलाज कराते-फिरते हैं। इस प्रकार के लोग भ्रम और अज्ञानता के शिकार होते हैं, नपुंसकता के नहीं। हस्तमैथुन के शिकार युवक 35-40 वर्ष की आयु मंे आकर अपने आपको नपुंसक समझने लगते हैं। जवानी में अत्यधिक संभोग कर गुजरने वाले लोग भी आयु अधिक होने के उपरान्त अपने आपको बिना वजह कमज़ोर समझ बैठने की गलती कर बैठते हैं और जीवन को नीरस कर लेते हैं। कुछ नौजवान जो जवानी में 3-4 बार लगातार संभोग क्षमता रखते थे, आयु बढ़ने पर अपने आपको अक्षम समझने की गलती कर हकीमों के चक्कर लगाते रहते हैं। अतः यह तय है कि जन्मजात नपुंसकता के मामलों को यदि छोड़ दिया जाये तो कोई पुरूष नपुंसक नहीं होता है। यदि किन्हीं कारणों से मैथुन क्रिया पूर्ण सम्पन्न नहीं हो तो इसकी वजह नपुंसकता कतई नहीं है। बल्कि मस्तिष्क में उठे अन्य विकार मैथुन को असफल कर देते हैं, नपुंसकता नहीं। नपुंसकता होती ही नहीं है। यह मात्र मन का भ्रम है। यदि मन का यह भ्रम दूर हो जाये तो भ्रम को पालकर रखने वाला व्यक्ति भी सफलतापूर्वक स्त्री के साथ मिलन कर सकता है। आत्मविश्वास की कमी ही नपुंसकता है। जिस पुरूष में आत्मविश्वास की प्रबल शक्ति होती है, वे किसी भी उम्र में स्त्री को संतुष्ट कर सकते हैं। साथ ही वे स्वयं भी आत्म संतुष्टि प्राप्त कर सकते है। कई ऐसे वृद्ध पुरूषों को मैं जानता हूं जो 70-75 वर्ष की आयु में भी अपना दाम्पत्य जीवन सुखपूर्वक भोग रहे हैं। ऐसे युवा जोड़ों को भी मैं जानता हूं जिनका जीवन नीरस-बेजान, रूखा-सूखा है। उनके जीवन में किसी प्रकार का जोश नहीं, उमंग नहीं, उत्साह नहीं है। इसका कारण है आत्मविश्वास और मनोबल की कमी तथा स्त्री-पुरूष के आपसी तालमेल में अभाव उत्पन्न हो जाना।

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रोगजन्य नपुंसकता-

यथार्थ में नपुंसकता कोई रोग नहीं होता, बल्कि यह मनुष्य की अपनी गलतियों का एक परिणाम भर है। इसके अलावा शरीर में ऐसे कई रोग भी हो सकते हैं, जो नपुंसकता के कारण बनकर रोगी को जीवन भर नपुंसकता का शिकार बनाये रख सकते हैं।

कई ऐसे रोग हैं जो नपुंसकता को जन्म देते हैं, जिनमें से प्रमुख रोग निम्नलिखित हैं-
1. मधुमेह-प्रमेह।
2. मूत्र-प्रजनन अंगों की विकृति यथा सुज़ाक, उपदंश मूत्रपूय, मूत्रकृच्छ आदि संक्रामक तथा अन्य रोग।
3. मेदवृद्धि-मोटापा।
4. अण्डकोष की वृद्धि।
5. सुषुम्ना संबंधी रोग एवं विकृति।
6. वृक्क रोग एवं विकार।
7. हृदय रोग।
8. यकृत रोग एवं विकार।
9. अंतःस्रावी ग्रन्थियों की विकृति।
10. मानसिक विकृति आदि।

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